सफ़र, शून्य तक

नौकरी की नैया में होने को सवार,
बैठा है मांझी लिए नयी पतवार |

उठता है वो जब कदम बढाने को,
कुछ पुरानी यादें और कुछ गुमनाम बातें,
मन के प्रोजेक्टर से इस्लाइड शो दिखाती हैं |
फिर भी वो हताश नहीं होता,
दूर नज़र दौडाता है समुन्दर में |
नज़रों की राह चुराते हुए तभी,
हवा का एक झोंका होंठो को टेंजेनशली छु जाता है
और होंठो का करवेचर कुछ ओवल सा बन जाता है|
उसी अलसाई शाम में सूरज की लालिमा
पतवार की धार पे चमकती है और
मांझी की दुविधा दो कदम और बढती है |
वो कुछ और गंभीर हो जाता है और
स्वयं की अवस्था के आंकलन में लग जाता है |
किनारे से क्षितिज तक के सफ़र में मन ही मन
वो ह्रदय की ख़ुशी के इंडेक्स का ग्राफ बनाता है |
एक सटीक विश्लेषण के बाद जब,
मांझी एक सौ अस्सी डिग्री रोटेट होता है,
तो समय के पहिये की मार खायी ज़मीन को,
पांव के नीचे से नदारत पाता है |
मांझी को था अब पता,
की ये गेम है जिसमे मस्तिष्क,
या तो है भंवर में या उड़ता है,
हर उस डगर पे जहां ले जाना चाहो
उसको पकड़ के |
नैया, पतवार और बाकी सारी छवियाँ,
अब बन चुकी थी एक वैकल्पिक दुनिया
मांझी था, था वो मांझी,
अब क्या है, ये किसने जानी ?

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जीवन एक रंगमंच

सुना था कि जीवन एक रंगमंच है,
श्वास का प्रवाह जिसका केवल एक अंश है |

कितना इसमे सत्य और कितना असत्य,
करना इसको पता था मेरा लक्ष्य |

करने इसकी खोज निकला एक उड़ान पर,
मिलते गए विभिन्न चरित्र  हर पेड़ कि शाख पर |

कहीं बढे थे हाथ और कहीं हुए विवाद,
जब हुई थी बरसात या बिछी थी बिसात |

कहीं बहा मैं धारा में  और कहीं मोड़ा मैंने रुख,
डर था, कि जीवन कि इस दौड़ में कहीं जाऊं ना मैं रुक |

आवरण बदलता गया, बदलती रही मान्यताएं,
ह्रदय हुआ शिथिल, उसकी वाणी ना सुन पाए |

इस राह में कई बार गुज़रा मैं आक्रोश, उत्तेजना और आनंद के दौर से,
भ्रम में पड़ गया था मैं ,
कि ये मैं ही हूँ या रंग रहा है कोई मुझे अपनी कल्पना  के मंच पे!
……………….जीवन एक रंगमंच है,
श्वास का प्रवाह जिसका केवल एक अंश है |


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पर्दा फाश

एक व्यक्ति था आज, बड़ी भीषण सी नींद में,

चल नहीं पा रहा था वो, जीवन की भीड़ में |

फिर पता चला उसे, एक रहस्यमयी राज़,

जिसका कर डाला उसने, पर्दा फाश |

राज़ था – क्यूँ रहता है सर टेढ़ा परांजपे नामक जीव का,

इस तरह कवि ने कर डाला उपयोग, फ़ालतू से टाइम का |

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अंतिम उदघोष

एक साल पहले, कुछ कलियाँ मिली

खिलने से पहले, मुरझा  वो गयीं

सूरज का ओज, कुछ कम था  शायद

हार का बोझ, एक भ्रम था शायद

फिर बनके फूल, वो डट के लड़े

अब हवा का रुख और जीत की भूख

है उनके पास

होना नहीं है हताश

कर दो सारे प्रयास

और बुझालो अपनी प्यास

बुझालो अपनी प्यास……

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एक रहस्यमय सूची

इशु स्मृति, सम्पदा हमारी
बरसे मेघा,अद्भुत सी अनुभूति
कोमल अनुभव जैसे स्वर्णिम दीपाली
श्वेत है मन और गर्वित ह्रदय
हर कनिका है अंकित, परिवर्तित है राशी
अस्मिता जसलीन, गरिमा से परिपूर्ण
स्वयं से नेहा , जब आकांक्षा सम्पूर्ण |

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एक कवि का पुनर्जन्म

कशिश थी एक, दिल में दबी,
पुरानी कहानी, खोयी कहीं |
ना जाना ये मैंने, कहाँ से शुरू,
ठिकाना मिले अब, तो डट के लडूं |
पन्ने जो पलटे, तो पाया यही,
कमज़ोर डोर, कभी ना बढ़ी |
दिल को टटोला, तो जागी उमंग,
पाया ये मैंने, की जड़ है अटल |
अरमान अब जीवित, नया है पथ.
उर्जा नवोदित और चिन्हित है लक्ष्य |

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